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कभी कभी सोचती हूं कि मैं ये क्या सोचती हूँ

 कभी कभी सोचती हूं कि मैं ये क्या सोचती हूँ  जाने कौन से ताने बाने में उलझती जूझती हूं ये पकड़ना ये छोड़ना ये बेमतलब दौड़ना तो सकपकाई सी इस संघर्ष का विराम ढूंढती हूँ  और फिर वही सोचती हूं कि मैं ये क्या सोचती हूँ  जाने कौन से ताने बाने में उलझती जूझती हूँ  क्या खोया क्या पाया और क्या कुछ बचाया जमा पूंजी के बही खाते में एहसास टटोलती हूँ  तो मुस्कुरा कर सोचती हूं कि मैं ये क्या सोचती हूँ  जाने कौन से ताने बाने में उलझती जूझती हूँ  क्या कल था क्या आगे और कितना आज में जागे इस सब में कुछ  अलग सा रोज खुद को देखती हूँ  हैरान सी मै भी ये सोचती हूं कि मैं ये क्या सोचती हूं  जाने कौन से ताने बाने में उलझती जूझती हूँ  ये माप दंडों की लड़ाई ये जग में बड़ाई  इस सब में उलझ जब मैं खुद को तोलती हूँ  तो समझ कर इसे हरि से ही पूछती हूँ  कि बोलो तुम्ही मै ये क्या सोचती हूँ क्यूँ ही इस ताने बाने में उलझती जूझती हूँ

udhaar

एक तो समय से ये जो उधार ले रखा है और ये जालिम ब्याज का बहुत पक्का है कभी नींद काम पर लगती कभी थकान दौड़ी जाती है और ऐसे में बीमारी बातें बनाने को जाने कहां से आती है पर बात ये है कि उसकी बातें मुझे पसंद ही कहाँ हैं जिसकी संगत कभी बुखार कभी जुखाम कभी दवां है  ऐसे में अक्सर ये जो मन है ना टोह लेने आता है सवालों के उस पर भी मेरा सवाल सा टंग जाता है ये चिंता है या ताना है उस से ही पूछ बैठती हूँ  और फिर जवाब में खुश हूँ बोल जैसे कमाई पर ऐंठती हूँ  देख उधार उसका है पर जल्दी मुझे है तू ही बता क्या समय का भरोसा तुझे है और फिर नींद और थकान को तो चैन के संग जाना है ये उधार ब्याज उतार कर इनका भी ब्याह कराना है उठ कर बोली मैं अब बहुत हुआ तू भी काम पर लग मन यूं ही अलसाया सा बोला कल भी यहीं रहेगा जग अब थोड़ा गुस्सा कर मै बोली यूं ही उन्नति  तुम्हे मिल जाएगी तुम राह देखते रहना और वो निश्चय के साथ निकल जाएगी  फिर मुस्कुरा कर उठा बोला मैं उससे भी ज्यादा मेहनत कर लूंगा तुम अपने काम पर लगो मै तो उन्नति को पाकर ही दम लूंगा

जब जब तृष्णा मृगतृष्णा में बदली

देखा है ठंड का मौसम कैसे तृष्णा बढ़ाता है फिर अकसर यही मौसम सीखा मुझे कुछ जाता है उनीदी सी नींद से जब जब ये प्यास उठाती है गरमाई चादर मेरी लिपट आगे मुझे बढ़ाती है खिड़की से झांकती आग और उसकी वो गरमाई दुनियादारी की इसी तपिश में मैं भी कुछ भरमाई  बेखबर सी चादर पकड़ जब इसी आग ने खाई रंगबिरंगी मेरी चादर आधी स्वाह आधी स्याह हो आई  और तब पकड़ ठंड ने मुझे ये बात समझाई पगली ये चादर ही तेरी अपनी है इसे क्यों खो आई इच्छाओं को रंग देती है यही भाग्य कर्म की बुनाई दुनियादारी की अग्नि तो जीवन के पश्चात ही काम आई

21 से 21 का संवाद

उसने पूछा.... जो 21 ज्यादा है तो इसमें कम क्या है और जो हो भी गया तो इसमें गम क्या है जवाब आया... मेरी आँखों में क्या गम दिखता है? मेरे चेहरे से कुछ ऐसा झलकता है? सुनकर बोला... कभी कभी तुम्हारी माँ के चेहरे पर देखा है कभी तुम्हारे पापा की बातों मे झलका है तो जवाब आया... हाँ माँ को कभी कभी ऐसा लगता है की उसके अलावा कोई मुझे समझता है? इस पर 21 ने पूछा फिर.... बस जब भी माँ का मन भर आता है मेरे मुस्कुराता चेहरा कुछ समझा जाता है क्या... उसने फिर पूछा की हमारे प्रारब्ध मे भावनाओ का प्रसार है और फिर ये तो दुखों का संसार है इस पर दुनियादारी मे 21 थोड़ा उलझा सा बोला मतलब.... मतलब की कौन है जिसे कोई गम ही नहीं क्या तुम्हारा समझदारी मे कोई सम नहीं जवाब आया... नहीं मेरा 21 तो मापदंड पर निर्धारित है और ये मूलभूत रूप मे 21 से ही रहित है यही मै समझाना चाह रहा था मेरा 21 मुझे Down syndrome बनाता है पर इस दुनिया मे तुम्हारे 21 को ये कहीं नहीं पहुंचाता है ये तो बस इस संसार की सोच का विकार है जिसके कुछ अलग से मापदंड इसका आधार है खुशियों मे हमारा परिवार किसी से कम ही नहीं क्यूंकि हमारे हौसले और उम्मीद का क...

What do we do?

  What do we do? It’s a question for me as well as you We ask for all the reports, not just few Drawing squares circles lines for some clue To make a possible diagnosis that was long due Wondering at times on the hopes we have to live up to….. And you must be wondering what do we do? In labs there are different frontlines Increasing information of forever new guidelines At times somehow chasing the reporting deadlines Collaborating the findings for all that your report defines Thinking at times of about the nature of nature’s confines …. Are you still thinking on what do we do? Prevention is better than cure For prenatal counselling we assure With even a category for pills you had before NIPT, dual marker, ultrasound are tests, for we want to be sure Still questioning at times was it enough or could we do some more….. Are you still questioning what do we do? Not every genetic problem has a solution But for some it is just the diet, that is ...

Is it really random?

  They say it is a random process of mutation Then remind that it is a survival of selection How then the trisomies are rescued in embryo Is it really a gamble of 23 pairs with one cameo Do we really expect that many permutation Or is it really a good mathematical calculation What causes some chromosomes just to pass Leaving few in birds of paradise as sex specific cause This information is huge just to surrender To a chance equivalent to a big blunder If only one read about paramecium and tetrahymena It is easy to realise about micro and macronuclear arena The assembly that is broken to reassemble each time Carrying the information with an environmental rhyme Why the translocation breakpoints are so aligned That they can be traced with a PCR or probe refined The mutations that are called hot spots as they occur Are these really the ones amongst so many that conquer And is cancerous outnumbering really a matter of chance Or is it also a surviva...

जजबातों का दौर चला

  जजबातों का दौर चला ना जाने किस ओर चला जाने कितने अवसाद  रहे कुछ भूल पड़े कुछ याद रहे पर कही कुछ कचोटता है धीमे धीमे मन टटोलता है क्या जीवन क्रम मे यही होता है सत्य यूँ ही बस सोता है सत्य को सत्यापित करने को भाषा के सरल से झरने को आवारन भाव का धरना होगा नहीं तो मौन ही मरना होगा वाकपाटूता का दौर मे सत्य छुपा किसी ओड मे जिज्ञासा का अंत हुआ विचारहीनता मंत्र हुआ इतिहास तनिक खगोलो तो ईस्वी नहीं कारण टटोलो तो जिज्ञासा जब जब गौण हुई परिस्तिथियो को थामे मौन हुई कौन आगे बढ़ा बस चलता रहा ओर समाज खुशियों की परिभाषा बदलता रहा चलो मानो एक पुल बनाना है जिसे सदियों तक चलाना है ओर पूरी जिम्मेदारी तुम्हारी है ओर जो नहीं कोई तैयारी है तो भी वक़्त कोई कमी नहीं बस नीव ऐसी ना हो की थमी नहीं कितना इस पर विश्लेषण हो की चलने पर शंका ना इक क्षण हो बात अनुकूल लगी तो बस सुनकर पुल बना दोगे मन के भरोसे पर  या भावनाए बोझ संभाल लेगी तथ्य ओर तर्क का स्थान लेंगी जीवन इसी पुल जैसा लगता है बनाने मे कौन क्या चुनाव करता है तथ्यों का चुनाव जरुरी है श्रम यत्न नहीं मजबूरी है यूँ बस हंस खेल गाकर चल दिए जो बस आकर ज...