udhaar

एक तो समय से ये जो उधार ले रखा है
और ये जालिम ब्याज का बहुत पक्का है
कभी नींद काम पर लगती कभी थकान दौड़ी जाती है
और ऐसे में बीमारी बातें बनाने को जाने कहां से आती है
पर बात ये है कि उसकी बातें मुझे पसंद ही कहाँ हैं
जिसकी संगत कभी बुखार कभी जुखाम कभी दवां है 
ऐसे में अक्सर ये जो मन है ना टोह लेने आता है
सवालों के उस पर भी मेरा सवाल सा टंग जाता है
ये चिंता है या ताना है उस से ही पूछ बैठती हूँ 
और फिर जवाब में खुश हूँ बोल जैसे कमाई पर ऐंठती हूँ 
देख उधार उसका है पर जल्दी मुझे है
तू ही बता क्या समय का भरोसा तुझे है
और फिर नींद और थकान को तो चैन के संग जाना है
ये उधार ब्याज उतार कर इनका भी ब्याह कराना है
उठ कर बोली मैं अब बहुत हुआ तू भी काम पर लग
मन यूं ही अलसाया सा बोला कल भी यहीं रहेगा जग
अब थोड़ा गुस्सा कर मै बोली यूं ही उन्नति  तुम्हे मिल जाएगी
तुम राह देखते रहना और वो निश्चय के साथ निकल जाएगी 
फिर मुस्कुरा कर उठा बोला मैं उससे भी ज्यादा मेहनत कर लूंगा
तुम अपने काम पर लगो मै तो उन्नति को पाकर ही दम लूंगा

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