शब्दों के पिटारे
शब्दों के पिटारे में अजीब अटपटे से शब्द आए है
कुछ कसैले से जैसे हो पर जाने हम क्यों मुंह में दबाए है
मन है निकाल दें इन्हें और फेंक दें बनाने वाले पर
पर क्या करें कलयुग है तो क्या इसकी भी सीमाएं है
जो साथ चला मेरे हरदम ये उसकी शिक्षाएँ है
उठ कर पानी पी ले और बदल पिटारा अपना अब
मिठास वाले शब्दों से बुन जो भी तेरी इच्छाएं है
Wah..bahut sunder
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