कभी कभी सोचती हूं कि मैं ये क्या सोचती हूँ
कभी कभी सोचती हूं कि मैं ये क्या सोचती हूँ
जाने कौन से ताने बाने में उलझती जूझती हूं
ये पकड़ना ये छोड़ना ये बेमतलब दौड़ना
तो सकपकाई सी इस संघर्ष का विराम ढूंढती हूँ
और फिर वही सोचती हूं कि मैं ये क्या सोचती हूँ
जाने कौन से ताने बाने में उलझती जूझती हूँ
क्या खोया क्या पाया और क्या कुछ बचाया
जमा पूंजी के बही खाते में एहसास टटोलती हूँ
तो मुस्कुरा कर सोचती हूं कि मैं ये क्या सोचती हूँ
जाने कौन से ताने बाने में उलझती जूझती हूँ
क्या कल था क्या आगे और कितना आज में जागे
इस सब में कुछ अलग सा रोज खुद को देखती हूँ
हैरान सी मै भी ये सोचती हूं कि मैं ये क्या सोचती हूं
जाने कौन से ताने बाने में उलझती जूझती हूँ
ये माप दंडों की लड़ाई ये जग में बड़ाई
इस सब में उलझ जब मैं खुद को तोलती हूँ
तो समझ कर इसे हरि से ही पूछती हूँ
कि बोलो तुम्ही मै ये क्या सोचती हूँ
क्यूँ ही इस ताने बाने में उलझती जूझती हूँ
Very nice...
ReplyDeleteBeautiful
ReplyDeleteVery beautiful👌
ReplyDeleteBahut badiya👍🏼
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